एक दिन का बीतना,
बीतना नही होता।
बीतने में दो-चार दिन भी कम पड़ते हैं।
बीतना कई दिनों को बात होती है।
एक दिन पिघले तो,
बस कुछ बूँदें।
अगर दो-चार दिन पिघलें,
तो भीगना।
बहुत दिन पिघलकर,
बन सकते हैं,
नदी,
बाढ़,
दरिया।
फिर बहकर मिल सकते हैं
सागर से।
दिन पिघलकर सूख भी सकते हैं।
जैसे नदी सूखती है।
मिटती है।
सूखना एक प्रक्रिया है,
और एक आयाम भी।
जैसे अपने अस्तित्व का समर्पण।
इन पंक्तियों में भी,
कई दिन बीत गए।
बह गए।
सिमट गए।
मैं भी बीता इन दिनों में।
सूखा।
जैसा शुरू हुआ था,
उससे कुछ पिघलकर।
अब बह रहा हूँ,
निरंतर।
बीत रहा हूँ, मिलने,
किसी सागर से एक दिन।
1 comment:
Bahut shandar gyandar
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