एक यायावर
"आज तुम शब्द दो ना दो फिर भी मैं कहूँगा" - सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'
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Apr 22, 2012
किस्मत
कभी जुड़ती
कभी मुड़ती
कभी खिंचती
कभी रुकती
बिछी हैं ये लकीरें
इस काल में
जिसका अंत
निश्चित है
कभी किसी रोज़
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