किताबें भी मरती हैं
मरती हैं क्योंकि
धड़कती हैं।
धड़कती हैं
इसलिए ही मरती हैं।
जो किताबें बकबकाती हैं
वो देर से मरती हैं।
जिनके पास कहने को कुछ नहीं
वो अल्पायु होती हैं।
किताबें आत्महत्या नहीं कर पातीं।
उन्हें मारा जाता है-
तिरस्कार से
उपेक्षा से
और दीमकों की फ़ौज से।
किताबों ने जब भी कोई जौहर बताया,
उन्हें ख़ुद जलना पड़ा।
इंसानों की तरह
किताबें बीमार नहीं होती।
उनका प्राण प्रवाह
स्वयं,
मद्धम नहीं होता,
क्षीण नहीं होता
विलुप्त नहीं होता।
उसे बस भुला दिया जाता है।
यद्यपि प्रत्येक स्पर्श से वे
पुनः जीवंत हो उठती हैं।
किताबें ख़ुश रहती हैं
जब घरों में होती हैं।
किताबें उदासीन होती हैं
पुस्तकालयों में।
पुस्तकालयों में अब कोई नहीं जाता
उन्हें स्पर्श करने।