Jun 7, 2026

किताबें

किताबें भी मरती हैं 

मरती हैं क्योंकि 

धड़कती हैं। 

धड़कती हैं 

इसलिए ही मरती हैं। 


जो किताबें बकबकाती हैं

वो देर से मरती हैं। 

जिनके पास कहने को कुछ नहीं

वो अल्पायु होती हैं। 


किताबें आत्महत्या नहीं कर पातीं। 

उन्हें मारा जाता है- 

तिरस्कार से 

उपेक्षा से 

और दीमकों की फ़ौज से। 


किताबों ने जब भी कोई जौहर बताया, 

उन्हें ख़ुद जलना पड़ा। 


इंसानों की तरह

किताबें बीमार नहीं होती। 

उनका प्राण प्रवाह

स्वयं, 

मद्धम नहीं होता, 

क्षीण नहीं होता

विलुप्त नहीं होता। 

उसे बस भुला दिया जाता है। 

यद्यपि प्रत्येक स्पर्श से वे 

पुनः जीवंत हो उठती हैं। 


किताबें ख़ुश रहती हैं

जब घरों में होती हैं। 

किताबें उदासीन होती हैं

पुस्तकालयों में। 


पुस्तकालयों में अब कोई नहीं जाता 

उन्हें स्पर्श करने। 

Apr 13, 2026

बीतना

एक दिन का बीतना,

बीतना नही होता।

बीतने में दो-चार दिन भी कम पड़ते हैं। 

बीतना कई दिनों को बात होती है। 


एक दिन पिघले तो,

बस कुछ बूँदें। 

अगर दो-चार दिन पिघलें,

तो भीगना।

बहुत दिन पिघलकर, 

बन सकते हैं,

नदी, 

बाढ़, 

दरिया।

फिर बहकर मिल सकते हैं

सागर से। 


दिन पिघलकर सूख भी सकते हैं। 

जैसे नदी सूखती है। 

मिटती है। 

सूखना एक प्रक्रिया है,

और एक आयाम भी। 

जैसे अपने अस्तित्व का समर्पण। 


इन पंक्तियों में भी,

कई दिन बीत गए। 

बह गए। 

सिमट गए। 

मैं भी बीता इन दिनों में। 

सूखा। 

जैसा शुरू हुआ था,

उससे कुछ पिघलकर।


अब बह रहा हूँ,

निरंतर।

बीत रहा हूँ, मिलने, 

किसी सागर से एक दिन।

Aug 15, 2025

आवाज़ों के दो रूप

बंद कार के अंदर, 

बाहर की आवाज़ें, 

सुनाई नहीं देतीं। 

उसी बंद कार के, 

अंदर से आवाज़ें, 

बाहर नहीं जातीं। 


बंद कार के शीशे, 

एक दुनिया को, 

दो बना देते हैं। 

बंद कार में, 

बंधीं, रहती है दुनिया। 

और उसी बंद कार, 

के बाहर की दुनिया, 

रहती है बहती। 


बंद कार, चलती- रुकती, 

रहती है बढ़ती। 

उसी बंद कार को,

छूती, टकराती आवाज़ें, 

थमीं हैं रहती। 


वही आवाज़ें, 

उम्र से बँटी, 

सिमटती- बिखरती, 

रास्तों पर या फिर ट्रैफिक सिग्नलों पर, 

रहती हैं मरती। 


और कार के, 

अंदर की आवाज़ें? 

किंचित, 

आह न भरती। 

Apr 8, 2023

उम्र

वो लौटना चाहता था। 

वापस।

शुरू की शुरुआत में। 


जो जिया, जो भुगता था। 

पुनः वांछित। 

मोह की बुभुक्षा में। 


वो समझ रहा था। 

बढ़ना आगे। 

व्यर्थ है अंधकार में। 


अतः कर रहा था। 

प्रयास। 

यथार्थ के अपवाद में। 


पर जो शुरू हुआ था। 

अब कहाँ था। 

उम्र के इस मुक़ाम में। 


निरंतर चलना ही था। 

सबका प्रारब्ध। 

पूर्वनिश्चित अनुपात में। 


बदलाव का ठहराव नहीं था। 

संभव। 

जीवन के इतिहास में। 

Mar 19, 2023

साल का हाल

 

साल का हाल 

पूछते नही 

बूझते हैं। 


खेतों की दरारों से

ब्याही बिटिया के अविरल ठहाकों से

विरह गीत में फूटते आंसुओं से

तो किसी खुली पड़ी नींव में उपजे पीपल के चार पत्तों से। 


साल का हाल 

बूझते नही 

पूछते हैं। 


रिश्तेदारों से त्योहारों में,

भारी होते व्यवहारों में

बुझते इश्क़ की वफ़ादारी में

तो किन्ही अटकती साँसों का लम्बी बीमारी में।