Jul 5, 2020

एक सूखा कोना

कोने में दुबका 
एक सूखा गमला। 
नकारा।
बिदका। 

राह से हटकर, 
राह में, इसकी 
की कब बहाली हो। 

वेदना से ज़्यादा, 
रूखी मिट्टी, उसमें
और तीन शुष्क डंडियाँ।

डर से कुम्हलाती, 
ये सोचती, 
गिर ना जाएँ गमले से बाहर, किसी रोज़। 

जब तक खूँसी हैं, 
गमले में। 
अलंकृत है वो कोना। 
गमले से। और। 
उसमें खुँसी
तीन मुरझाई डंडियों से। 

Jun 30, 2020

चऊतरे पे

सुबह-सुबह, 
चऊतरे पे,
ऊ सरऊ उठतै,
झाड़ू फेरत रहिन,
झाड़ा जाऐ के बाद। 

बोलत कुच्छो नाही। 
अइसे की जईसे,
चौधरी बने बैइठे, 
इतरावत हैं।  

और अगर तुम कुच्छो बोल देयो, 
तो बस पिरपिराए लगि।
बुढ़ऊ के आवाज तो निकली ना,
रत्ती भर,
बस गुर्राई कऊनो बिलार जैसन।

एक दिन एक कुकरवा हग दीहिस
चऊतरे पे।
जौन तहलका मचाएस ऊ सुवेरे-सुवेरे। 
गंगा माई बहवाए दीहिस,
चऊतरे पे।
सब मुहल्लौ धुल गवा ई चक्कर में। 

एक दिन एक मजूर सोई गवा ओके 
चऊतरे पे।
भाई ई किचाइन मचाएस ऊ सुवेरे-सुवेरे। 
मजुरवा सर पटक दीहिस और बोलिस “अब ना आबे कभी ई 
चऊतरे पे”।
सन्नाटा जबरन छवाई गवा ई चक्कर में। 

एक रात ओकर लड़कवा पीकर लोटत रहा
चऊतरे पे।
बाप रे बाप, ऐसन बवाल किहिस ऊ सुवेरे-सुवेरे। 
कोर्ट-कचहरी सब नाप दीहिस,
चऊतरे पे।
बचौना घर से भाग गवा ई चक्कर में। 

आजै के दिन, औंधा लेटा सोवत रहा ऊ 
चऊतरे पे।
सबहे जनी आइन ऊंहाँ सुवेरे-सुवेरे। 
जौऊन चल ना पाइस ऊहु आइके माथा टेकिस,
चऊतरे पे।
ऊ चौतरा बनिस मंदिर ईके चक्कर में। 

उजाले की मशाल

उजाले ने बदली चाल, 
जैसे बहती राल, 
छोड़ बुद्धि की ताल, 
रची साजिश, 
फूंका धैर्य, 
दागा मन,
चढ़ा मस्तक और बदला काल।

जिसमें।

हर कोई उजाला थूक रहा, 
यत्र, तत्र, सर्वत्र। 
या फिर, मूक बना घोंट रहा, 
बिना किसी अर्थ। 

अहो रूपम्, अहो ध्वनि” 
की भनभनाती भगदड़।
बुन रही एक नयी आस्था,
कर बंद आँखें, निधड़क।

तभी शायद।
क्षुब्ध तारों की ओज जितना
ज्ञान का आलोक पर्याप्त, बस उतना।

आह ! कैसी विडम्बना?  
जितना कम ज्ञान, 
उतना वो सर्वोत्तम विद्वान?

कदाचित मैं ही हूँ, 
इस अलौकिक जगत का ध्रुव तारा। 
अपना ऑक्सिजन मास्क छोड़, 
प्रयत्नशील हूँ, 
बनने को अचल सहारा।

Apr 4, 2020

निंदिया

चंदा मामा आते
पुए पकाते
और मुझे सुलाते 

माँ की लोरियाँ
थपथपाती
पिघलाती
ले जाती
दूर, बहुत दूर। 

माँ कहती,
निंदिया के अनेको घरौंदे। 
सब में छुपी, 
अनोखी कहानियाँ। 
चुपके-चुपके जा,
चुरा ला,
और फिर सबको सुना। 

मैं बुनती,
कुछ अटपटे सवालों के तानेबाने। 
होना था बड़ा 
माँ जैसा। 
जल्दी जल्दी, 
उड़ना,
और फिर दुनिया को छूना। 

मैं और माँ,
दोनो की अपनी ख्वाहिशें। 
उनको निंदिया,
मुझे सपनों का सातवाँ घोड़ा। 
एक नया,
आसमाँ, 
और चंद्रमा मेरा अपना। 

आज,
निंदिया के छुटपुट टुकड़ों
में टटोल रही हूँ, 
वही कहानियाँ 
जो चुरा कर लायी थी 
कभी माँ के लिए। 

Jul 24, 2019

अमरूद की दोस्ती

अमरूद,
तुम्ही मेरे सच्चे दोस्त रहे ।
जब गर्मी मुझे पका जाती
उबा देती,
दिनों के अंतहीन विराम से।
और जब स्कूल की
नयी कक्षा का
जोश बन जाता दोष ।
तब तुम फूट पड़ते
बरसात के साथ,
सौंधी खुशबू ओढ़े।

पर
भाव तुम्हारा बिगड़ैल रहता,
कड़क, खट्टा और पथरीला ।
जैसे की मेरा,
हर सुबह की ब्रम्ह वेला में।
जब पापा की "उठो बेटा उठो" की रट,
लगातार,
लालटेन की कुलबुलाती रोशनी संग,
पेचकस करती रहती कानो में ।

गुड़ सी मीठी धूप,
जब खिलती सर्दीयों में।
तब कहीं तुम पिघलते,
और नर्म हो जाते
कच्ची गरी जैसे
रसभर, विनम्र।
कभी गुलाबी, कभी सुफेद ।

तुम्हे काटने का,
नमक-मिर्च लपेटने का,
और फिर चुटकियों सी फांक में,
खाने का।
सुख, संतोष और स्वाद
अवर्णनीय है, उसी तरह
जैसे मम्मी की पीसी हुयी
तुम्हारी चटनी ।

अंततः तुम्ही वो दोस्त रहे,
जिसने मन को सर्वदा तृप्त किया।
कल भी
और आज भी ।
तकलीफ बस इतनी,
कि अब जब भी मिलते हो
एहसास करा देते हो
परदेस का ।